विष्णु दयाल ,ब्यूरो चीफ (फरीदाबाद) .

फरीदाबाद 25/03/2018: कुछ पुलिसवालों पर अपने ओहदे का नशा इस कदर हावी है की वो क़ानून को भी अपना ठेंगा दिखा देते हैं | Delhi हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्टर अनुश्री कल ज़मीन पर गिरे एक लड़के को पीट रहे पुलिसवालों की तस्वीर ले रही थीं। पास खड़े एक अफ़सर ने कहा इसका कैमरा तोड़ दो। फिर अनुश्री का कैमरा छीन लिया गया। एक दूसरी पत्रकार को एक पुलिसवाले ने धक्का दिया और ऐसा करते हुए उसकी छाती दबाई। बाद में पुलिस ने सफ़ाई दी कि उस पुलिसवाले ने महिला पत्रकार को छात्रा समझ लिया था। अब सवाल यह है कि क्या छात्रा का स्तन दबाना अपराध नहीं है? अगर नहीं है तो सरकार इसकी घोषणा कर दे। पुलिस मैनुअल में इसे शामिल करा दे।
फ़र्स्टपोस्ट के पत्रकार प्रवीण सिंह को हाथ में गहरी चोट लगी। दूसरे पत्रकारों के साथ भी बहुत कुछ हुआ। समझ में नहीं आ रहा है कि हम एक लोकतांत्रिक देश में हैं या फिर अलोकतांत्रिक देश में जहां पर पुलिस वाले पत्रकारों के साथ क्रिमिनल जैसा व्यवहार करते हैं तो आप कल्पना कर सकते हैं कि यह पुलिस वाले आम जनता के साथ कैसी अभद्रता करते होंगे और अभद्रता भी तब जबकि एक पुलिस अफसर ऐसा करने के लिए आदेशित करता है मैं इसकी निंदा करता हूं और उम्मीद करता हूं कि वक्त रहते हिंदुस्तान की लोकतांत्रिक व्यवस्था को वापस पटरी पर ले आया जाएगा और इसमें सरकार अपना पूरा योगदान करेगी।
ये कैमरे फ़ोटोजर्नलिस्टों ने पुलिस मुख्यालय के सामने रखे हैं। जहां पर फोटो जर्नलिस्ट ने अपने ऊपर हुए अत्याचारों का विरोध किया है मुझे लगता है यह अत्याचार अभी पुलिस मुख्यालय के सामने तक पहुंचा है कहीं ऐसा ना हो कि यह विरोध संसद के उन गलियारों तक भी पहुंच जाए जहां पर जवाब देना सरकार के लिए और सुरक्षाबलों के लिए चुनौती ना बन जाए।

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